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सोमवार, 18 मई 2020

राजस्थान जीके राजस्थान के भौतिक प्रदेश (Rajasthan Ke Bhotik Pradesh)


राजस्थान के भौतिक  प्रदेश  

वे प्रदेश जिनमें उच्चावच,जलवायु, प्राकृतिक वनस्पति, मृदा में पर्याप्त एकरूपता दृष्टि गत होती है। राजस्थान के भौगोलिक प्रदेशों का निर्धारण सर्वप्रथम प्रो.वी. सी. मिश्रा ने  राजस्थान का भूगोलपुस्तक में 1968  में किया।
                  धरातल एवं जलवायु के अंतरों के आधार पर राजस्थान को चार भागों में बाँटा जा सकता है।

राजस्थान के भौतिक  प्रदेश के नाम 

1 -उतर पश्चिमी मरुस्थलीय प्रदेश
2 -मध्यवर्ती अरावली पर्वतीय प्रदेश
3 -पूर्वी मैदानी प्रदेश
4 -दक्षिणी पूर्वी पठारी प्रदेश

राजस्थान के मरुस्थलीय प्रदेश एवं पूर्वी मैदानी प्रदेश टेथिस सागर के अवशेष हैं। 
Rajasthan Ke Bhotik Pradesh Map



उत्तरी पश्चिमी मरुस्थलीय प्रदेश -

उत्तरी पश्चिमी मरुस्थलीय प्रदेश राजस्थान के थार मरुस्थल का 3/5 भाग है। राजस्थान का मरुस्थल संपूर्ण भारत के मरुस्थल का 62% है जो राजस्थान के कुल क्षेत्रफल का दो तिहाई है। 

 थार के मरुस्थल के उपनाम- विश्व का सबसे घना बसा मरुस्थल ,सर्वाधिक जैव विविधता वाला मरुस्थल
रुक्ष क्षेत्र-  डॉ. ईश्वरी प्रकाश

राजस्थान का थार मरुस्थल 12 जिलों बाड़मेर, जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर, गंगानगर, हनुमानगढ़ में पूर्ण मरुस्थल तथा जालौर, पाली, नागौर, चूरू, झुंझुनूं,सीकर अर्ध्द मरुस्थल में विस्तृत है। 
थार मरुस्थल को उच्चावच के आधार पर चार उपभौतिक क्षेत्रों में बाटा गया है - 

महान मरू भूमि – 

                यह भारत पाक सीमा के सहारे कच्छ की खाड़ी से पंजाब तक फैला हुआ है| यह भूमि बालुका स्तूपों से ढकी हुई है| सहारा में इसे मरुस्थल को इर्ग कहते है| यह राज्य का शुष्क भाग है|

चट्टानी मरुस्थल – 

              यह बाड़मेर,जैसलमेर तथा बीकानेर के मध्य चट्टानों के रूप में फैला हुआ है| यहाँ कठोर चट्टानें समतल अथवा पहाडियों के रूप में फैली हुई है| सहारा में ऐसे मरुस्थल को हम्मादा कहा जाता है| यह बालुका मुक्त प्रदेश है। 

पथरीला मरुस्थल – 

                यह जैसलमेर के रुद्रवा व रामगढ क्षेत्र में पत्थरों के रूप में फैला हुआ है| सहारा में  ऐसे मरुस्थल को रेग कहा जाता है। 

लघु मरुस्थल – 

            यह प्रदेश चट्टानी प्रदेश के पूर्व में कच्छ के रण से प्रारंभ होकर बीकानेर के महान मरू भूमि तक विस्तृत है| यहाँ बालुका स्तूपों के मध्य वर्षा का पानी भर जाता है जिन्हें रन कहा जाता है। 

मरुस्थलीय प्रदेश में राजस्थान की 40% जनसंख्या निवास करती है। 
मरुस्थलीय प्रदेश में वार्षिक वर्षा का औसत 0 से 25 सेंटीमीटर होता है। 
रानीवाड़ा पश्चिमी राजस्थान का सर्वाधिक आर्द्र स्थान है। 
मरुस्थलीय प्रदेश में लूणी नदी बहती है तथा नहर इंदिरा गांधी नहर है। 
25 सेंटीमीटर वर्षा रेखा पश्चिमी मरुस्थल को दो भागों में विभाजित करती है। 

सम गांव-

        राजस्थान का वनस्पति रहित स्थान है। 

यह क्षेत्र दो भागों में बाँटा जा सकता है।
   (अ) पश्चिमी विशाल मरुस्थल या रेतीला शुष्क मैदा
  (ब) राजस्थान बांगर (बांगड़) या अर्द्धशुष्क मैदान
  
राजस्थान का थार मरुस्थल

 पश्चिमी विशाल मरुस्थल या रेतीला शुष्क मैदान-

  बालुका स्तूप-

                        रेत के टीलों को बालुका स्तूप के नाम से जाना जाता है स्थानीय भाषा में टीले या धरियन कहा  जाता है राजस्थान मरुस्थल का लगभग 60% भाग बालुका स्तूपों से आच्छादित है बालुका स्तूपों की लंबाई सामान्यतः 2 से 8 मीटर है। 

अनुदैर्ध्य बालुका स्तूप-

                  वायु  की दशा के समांतर बनने वाले बालुका स्तूपों  को अनुदैर्ध्य बालूका स्तूप कहा जाता है अनुदैर्ध्य बालुका स्तूप सर्वाधिक जोधपुर में पाए जाते हैं। 

अनुप्रस्थ बालुका स्तूप-

                   ऐसे बालुका स्तूप जिनका  निर्माण वायु की दिशा के लंबवत होता है अनुप्रस्थ बालुका स्तूप कहलाते  हैं अनुप्रस्थ बालुका स्तूप सर्वाधिक जैसलमेर में पाए जाते हैं।

पवनानुवर्ती (रेखीय) बालुकास्तूप-

                           ये बालुका स्तूप इस रेगिस्तानी भू-भाग के पश्चिम तथा दक्षिण भाग में मुख्यत: जैसलमेर, जोधपुर एवं बाड़मेर में पाये जाते हैं।
इन पर वनस्पति पाई जाती है।
इन स्तूपों में लम्बी धुरी वायु की दिशा के समनान्तर होती है।

पेराबोलिक बालुकास्तूप-

                   ये सभी मरुस्थली जिलों में विद्यमान हैं।
इनका निर्माण वनस्पति एवं समतल मैदानी भाग के बीच उत्पाटन (deflation) से होता एवं आकृति महिलाओं के हेयरपिन की तरह होती है।

ताराबालुका स्तूप-


मोहनगढ़, पोकरण (जैसलमेर), सूरतगढ़ (गंगानगर)।
इन बालुकास्तूपों का निर्माण मुख्य रूप से अनियतवादी एवं संश्लिष्ट पवनों के क्षेत्र में ही होता है।

नेटवर्क बालुकास्तूप-

                ये उत्तरी-पूर्वी मरुस्थलीय भाग- हनुमानगढ़ से हिसार-भिवानी (हरियाणा) तक मिलते हैं।
रेतीले शुष्क मैदान के पूर्वी भाग में बालुकास्तूप मुक्त प्रदेश भी है जिसमें बालुकास्तपों का अभाव है।
इस क्षेत्र को जैसलमेर-बाड़मेर का चट्टानी प्रदेश भी कहते हैं।
इस क्षेत्र में जरैसिक काल एवं टरशियरी व प्लीस्टोसीन काल की परतदार चट्टानों (अवसादी चट्टानों) का बाहुल्य है।
इयोसीन काल एवं प्लीस्टोसीन युग में इस क्षेत्र में एक विशाल समुद्र (टेथीस सागर) था, जिसके अवशेष यहाँ पाये जाने वाले चट्टानी समहों में मिलते हैं।
इनमें चूना पत्थर एवं बलुआ पत्थर की चट्टानें मुख्य हैं।
जैसलमेर शहर जुरैसिक काल की बलुआ पत्थर से निर्मितत चट्टानी मैदान पर स्थित है। इन चट्टानों में वनस्पति अवशेष एवं जीवाष्म (Fossis) पाये जाते हैं।
जैसलमेर के राष्ट्रीय मरुउद्यान में स्थित आकल वुड फोसिल पार्क इसका (जीवाश्मों का) अनूठा उदाहरण है।
इस प्रदेश की अवसादी शैलों में भूमिगत जल का भारी भण्डार है।
लाठी सीरीज क्षेत्र इसी भूगर्भीय जल पट्टी का अच्छा उदाहरण है। इन्हीं टीयरीकालीन चट्टानों में प्राकृतिक गैस एवं खनिज तेल के भी व्यापक भण्डार मौजूद हैं।
बाड़मेर (गुड़ामालानी, बायतु आदि) एवं जैसलमेर क्षेत्र में तेल एवं गैस के व्यापक भण्डारों के मिलने का कारण वहाँ टर्शियरी काल की चट्टानों का होना माना जाता है।
बेसर श्रेणी, जैसलमेर श्रेणी व लाठी श्रेणी में मध्यजीवी महाकल्प के जुरासिक कल्प की चट्टाने हैं। 

(ब) राजस्थान बांगर (बांगड़) या अर्द्धशुष्क मैदान -

राजस्थान बांगर (बांगड़) या अर्द्धशुष्क मैदान- अर्द्धशुष्क मैदान महान् शुष्क रेतीले प्रदेश के पूर्व में व अरावली पहाड़ियों के पश्चिम में लूनी नदी के जल प्रवाह क्षेत्र में अवस्थित है। यह आन्तरिक प्रवाह क्षेत्र है।
इसके उत्तर में - घग्घर का मैदान है
उत्तर पूर्व में -  शेखावाटी का आन्तरिक जल प्रवाह क्षेत्र है
दक्षिण-पूर्व में - लूनी नदी बेसिन है
मध्यवर्ती भाग में - नागौरी उच्च भूमि है।
यह संपूर्ण क्षेत्र शुष्क एवं अर्द्धशुष्क जलवायु के मध्य का संक्रमणीय या परिवर्ती (Transitional) जलवायु वाला क्षेत्र है।

इस सम्पूर्ण प्रदेश को निम्न चार भागों में विभाजित करते हैं -
घग्घर का मैदान
लूनी बेसिन या गौड़वाड़ क्षेत्र
नागौरी उच्च भूमि प्रदेश
शेखावाटी आंतरिक प्रवाह क्षेत्र


घग्घर का मैदान-

                           अर्द्धशुष्क प्रदेश के उत्तरी भाग में स्थित इस मैदानी भाग का निर्माण मुख्यतः घग्घर वैदिक सरस्वती, सतलज एवं चौतांग नदियों की जलोढ़ मिट्टी से हुआ है।
यह मुख्यतः हनुमानगढ़ एंव गंगानगर जिलों में विस्तृत है।
इस क्षेत्र में वर्तमान में घग्घर नदी प्रवाहित होती है, जो मृत नदी (Dead River) के नाम से भी जानी जाती है। वर्षा ऋतु में इसमें कई बार बाढ़ आ जाती है, जो हनुमानगढ़ जिले को जलमग्न कर देती है। यह नदी भटनेर के पास रेगिस्तान में लगभग विलुप्त हो जाती है।


लूनी बेसिन या गौड़वाड़ क्षेत्र-

                                                 लूनी एवं उसकी सहायक नदियों के इस अपवाह क्षेत्र को गौड़वाड़ प्रदेश कहते हैं।
इसमें जोधपुर, जालौर, पाली एवं सिरोही के क्षेत्र शामिल हैं।
इस क्षेत्र में जालौर-सिवाना की पहाड़ियाँ स्थित हैं जो ग्रेनाइट के लिए प्रसिद्ध हैं।
इसके अलावा मालाणी पहाड़ियाँ एवं चूने के पत्थर की चट्टानें भी इस क्षेत्र में पाई जाती हैं । इस प्रदेश में बालोतरा के बाद लूनी नदी का पानी नमकयुक्त चट्टानों, नमक के कणों एवं मरुस्थली प्रदेश के अपवाह तंत्र के कारण खारा हो जाता है।
इस क्षेत्र में जसवंतसागर (पिचियाक बाँध), सरदारसमन्द, हेमावास बाँध एवं नयागाँव आदि बाँध हैं|


नागौरी उच्च भूमि प्रदेश-

                       राजस्थान बांगड़ प्रदेश के मध्यवर्ती भाग को नागौर उच्च भूमि कहते हैं ।
इस क्षेत्र में नमकयुक्त झीलें, अन्तर्प्रवाह जलक्रम, प्राचीन चट्टानें एवं ऊँचानीचा धरातल मौजूद है।
इस क्षेत्र में डीडवाना, कुचामन, सांभर, नावां आदि खारे पानी की झीलें हैं जहाँ नमक उत्पादित होता है।
इस प्रदेश में गहराई में माइकाशिष्ट नमकीन चट्टानें हैं, जिनसे केशिकात्व के कारण नमक सतह पर आता रहता है। साथ ही नदियों द्वारा पानी के साथ नमक के कण बहाकर लाने आदि के कारण इनमें वर्ष-प्रतिवर्ष नमक उत्पादित होता रहता है।


शेखावाटी आंतरिक प्रवाह क्षेत्र-

                                                    बांगड़ प्रदेश के इस भू-भाग में चुरू, सीकर, झुंझुनूं व नागौर का कुछ भाग आता है।
इसके उत्तर में घग्घर का मैदान तथा पूर्व में अरावली पर्वत श्रृंखला है तथा पश्चिम में 25 सेमी सम वर्षा रेखा है।
इस प्रदेश में बरखान प्रकार के बालुकास्तूपों का बाहुल्य है।
इस प्रदेश की सभी नदियाँ काँतली, मेंथा, रूपनगढ़, खारी आदि आंतरिक जल प्रवाह की नदियाँ हैं, जो वर्षा ऋतु में इस भाग में बहकर या तो किसी झील में मिल जाती है या मैदानी भाग में विलुप्त हो जाती हैं।
मुख्य फसलें : बाजरा, मोठ व ग्वार
वनस्पति : बबूल, फोग, खेजड़ा, कैर, बेर व सेवण घास आदि।

 बरखान- 

         अर्धचंद्राकार रेत के टीलों को बरखान कहा जाता है। इनका निर्माण एक ही दिशा में चलने वाली से होता है। बरखान की ऊंचाई 10 मीटर तथा चौड़ाई 100 मीटर तक होती है बरखान सर्वाधिक मात्रा में शेखावटी क्षेत्र में पाए जाते हैं। शेखावटी क्षेत्र में सर्वाधिक बरखान सीकर जिले में पाए जाते हैं। 

उर्मिका - 

         बालुका स्तूप के  ऊपर लहरदार छोटी-छोटी परतों को उर्मिका कहते हैं। 

लाठी सीरीज क्षेत्र- 

                             लाठी सीरीज क्षेत्र जैसलमेर के पोकरण से मोहनगढ़ तक स्थित भूगर्भिक जल पट्टी को लाठी सीरीज क्षेत्र के नाम से जाना जाता है जैसलमेर में लाठी सीरीज क्षेत्र में पैदा होने वाली पोस्टिक घास सेवन घास गोडावण की शरण स्थली कहलाती है। 
चंदन नलकूप - थार का घड़ा जैसलमेर की सम तहसील में स्थित है। 
सेम- सेम राजस्थान की इंदिरा गांधी नहर में पाई जाने वाली प्रमुख समस्या है। 
पीवणा - पीवणा रेगिस्तान में पाया जाने वाला जहरीला सर्प है जो रात्रि में अपनी श्वास के द्वरा जहर  देकर व्यक्ति को मार देता है। 
प्याला-  बड़ी व बरसाती झीलों  को प्याले के नाम से जाना जाता है। 
रण/रन/टाट- बालुका स्तूपों  के द्वारा निर्मित वर्षा की अस्थाई झीलें रण कहलाती है। 
खडीन - मानव द्वारा निर्मित झीलें खड़ीन कहलाती है। 
बांगर - अनउपजाऊ मिट्टी के मैदानों को बांगर कहा जाता है। 
बांगड़ - माही नदी का मैदानी  क्षेत्र बांगड़ कहलाता है। 
खादर - नदियों द्वारा बहाकर लाई गई उपजाऊ मिट्टी के मैदानों को खादर कहते हैं। 
बीड- शेखावाटी क्षेत्र में पाए जाने वाले घास के मैदानों को स्थानीय भाषा में बीड़ कहा जाता है। 
रोही- अरावली पर्वतमाला की उपजाऊ हरी पट्टी को रोही कहते हैं। 
कूबड़ पट्टी क्षेत्र- नागौर, पाली व  अजमेर जिले के मध्य फ्लोराइड युक्त जल पट्टी को कूबड़ पट्टी क्षेत्र कहा जाता है।   
छप्पन की पहाड़ियां- राजस्थान के बाड़मेर जिले में 11 किलोमीटर लंबी श्रंखला को 56 की पहाड़ियों के नाम से जाना जाता है। 

अरावली पर्वतीय प्रदेश-

अरावली पर्वतमाला गोंडवाना लैंड का अवशेष है जिसकी उत्पत्ति प्री कैंब्रियन युग में हुई | अरावली पर्वतमाला की तुलना अमेरिका के अप्लाशियन पर्वत से की जाती है | अरावली पर्वतमाला विश्व की प्राचीनतम वलित पर्वत माला है।  जिसका विस्तार दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूरब की ओर है।  अरावली पर्वतमाला का विस्तार पालनपुर गुजरात से लेकर राजस्थान हरियाणा से गुजरकर दिल्ली में स्थित  रायसेन की पहाड़ी तक है। अरावली पर्वतमाला की कुल लंबाई 692 किलोमीटर है जिसमें से 550 किलोमीटर या 79.48% राजस्थान में है| राजस्थान में अरावली पर्वतमाला का विस्तार खेड़ा ब्रम्हा सिरोही से लेकर खेतड़ी झुंझुनू तक विस्तृत है। अरावली पर्वतमाला का सर्वाधिक विस्तार उदयपुर जिले में न्यूनतम विस्तार अजमेर जिले में है। अरावली पर्वतमाला का सर्वोच्च शिखर गुरु शिखर एवं सबसे नीचा  स्थान अजमेर में पुष्कर घाटी है। अरावली पर्वतमाला की औसत उंचाई 930मीटर है।  अरावली पर्वतमाला भारत की महान जल विभाजक रेखा कहलाती है। बंगाल की खाड़ी से आने वाले मानसून को रोकने का कार्य अरावली पर्वतमाला करती है। अरावली पर्वतमाला के समानांतर चलने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग NH8 है। अरावली पर्वत राजस्थान के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 9.3% भाग पर फैला हुआ है। अरावली पर्वतीय प्रदेश में राजस्थान की लगभग 10% जनसंख्या निवास करती है।अरावली को राजस्थान की जीवन रेखा कहा जाता है। 
अरावली पर्वतीय प्रदेश


अरावली की प्रमुख चोटियाँ-

रघुनाथगढ़ सीकर 1055 मीटर
मालखेत सीकर -1052 मीटर
भेजागढ़ झुंझुनू - 997 मीटर
खो पर्वत जयपुर – 920 मीटर
मोरामजी अजमेर  – 933 मीटर
भैराज पर्वत – 792 मीटर
तारागढ़ अजमेर – 870 मीटर
नागपहाड़ अजमेर 
सेर सिरोही 1597 मीटर
जरगा उदयपुर 1431 मीटर उदयपुर जिले की सर्वोच्च चोटी है|

ट्रिक – मोर ने नाग को तार से अजमेर में बांध दिया |
      रघु ने सकर के भेजा का माल निकल दिया |

गुरुशिखर सिरोही- 

               गुरुशिखर राजस्थान के सिरोही जिले में स्थित राजस्थान की सबसे ऊँची चोटी है जिसकी लम्बाई 1722 मीटर है अरावली की सर्वोच्च चोटी गुरु शिखर को कर्नल जेम्स टॉड ने संतों का शिखर कहा है। 

सिरोही जिले में स्थित प्रमुख चोटियां-

दिलवाड़ा सिरोही-1442
अचलगढ़ सिरोही-1380
जयराज सिरोही
ऋषिकेश सिरोही 1017
मलनाथ सिरोही 1001

नाल- 

     दर्रों को स्थानीय भाषा में नाल कहते हैं। 

 राजस्थान के प्रमुख दर्रे-


1 हाथी घोड़ा की नाल – यह दर्रा राजसमंद जिले में एनएच 76 पर स्थित है। 
2 फुलवारी की नाल- फुलवारी की नाल उदयपुर जिले में दर्रा  अभ्यारण में स्थित है। 
देसूरी की नाल- देसूरी की नाल पाली जिले में स्थित है जो देसूरी को चारभुजा राजसमंद से        जोड़ता है। 
4 केवड़ा की नाल व हाथी नाल- केवड़ा की नाल व हाथी नाल यह दोनों दर्रे उदयपुर जिले में स्थित है। 
रामगढ़ दर्रा लाखेरी दर्रा जैतवास दर्रा बूंदी जिले में स्थित है। 
जीलवा की नाल- यह मारवाड़ से मेवाड़ आने का रास्ता प्रदान करता है। 
भाकर- पूर्वी सिरोही की तीव्र ढाल वाली पहाड़ियां भाकर कहलाती है। 
गिरवा-  उदयपुर की तस्तरी नुमा  पहाड़ियां गिरवा कहलाती हैं। 
देशहरो- जरगा तथा रागा पहाड़ियों के मध्य का वह भाग जो वर्ष भर हरा भरा रहता है देशहरो कहलाता है। 
मेवल- डूंगरपुर बांसवाड़ा के मध्य का पहाड़ी भाग मेवल के नाम से जाना जाता है। 

राज्य के लगभग 70% खनिजो का उत्पादन अरावली पर्वतीय प्रदेश से होता है। 
अरावली पर्वत माला रेगिस्थान के पूर्वी विस्तार को नियंत्रित करती है। 
अरावली पर्वतीय प्रदेश को मुख्यतः तीन उप प्रदेशों में विभक्त किया गया हैं। 
1-  उत्तर-पूर्वी अरावली प्रदेश
2-  मध्य अरावली प्रदेश
3-  दक्षिणी अरावली प्रदेश

पूर्वी मैदानी प्रदेश- 

               पूर्वी मैदानी प्रदेश अरावली पर्वत माला के पूर्व में स्थित है। राजस्थान के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 23.9% भाग पर विस्तृत है। पूर्वी मैदानी प्रदेश 50 सेंटीमीटर की सम वर्षा रेखा द्वरा निर्धारित है। पूर्वी मैदानी प्रदेश में अलवर,भरतपुर,करौली सवाईमाधोपुर जयपुर दौसा टोंक एवं भीलवाडा तथा दक्षिण में डूंगरपुर बांसवाडा और प्रतापगढ़ शामिल है।   
पूर्वी मैदानी प्रदेश में राजस्थान की कुल 39% जनसंख्या निवास करती है। 
पूर्वी मैदानी प्रदेश सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाला प्रदेश है। 
पूर्वी मैदानी प्रदेश में वर्षा 50 से 80 सेंटीमीटर के मध्य होती है। 
बीहड़- नदियों के प्रवाह से बनी गहरी घाटियों को बीहड़ कहा जाता है| सर्वाधिक बीहड़ सवाई माधोपुर जिले में पाए जाते हैं। 
छप्पन का मैदानमाही नदी के मैदानी भाग को छप्पन का मैदान कहा जाता है। छप्पन का मैदान बांसवाड़ा से प्रतापगढ़ के मध्य भाग को कहा जाता है।  
कांठल- माही नदी का बहाव क्षेत्र को  कांठल जाता है। 
बागड़ –डूंगरपुर व बांसवाड़ा के क्षेत्र को बागड़ कहा जाता है। 
छप्पन का मैदान- प्रतापगढ़ व बांसवाड़ा के मध्य 56 गाँव नदी नालों का समूह छप्पन का मैदान कहा जाता है। 
अरावली पर्वतमाला का दक्षिण पश्चिम मानसून के समांतर फैली हुई है। 

दक्षिण पूर्वी पठारी प्रदेश-

                    दक्षिण पूर्वी पठारी प्रदेश राजस्थान के कुल क्षेत्रफल का लगभग 9.6% भाग पर फैला हुआ है। दक्षिण पूर्वी पठारी प्रदेश दक्षिणी पूर्वी पठारी प्रदेश कोटा बांरा बूंदी झालावाड में विस्तृत है। दक्षिण पूर्वी पठारी प्रदेश को हाडौती के पठार के नाम से जाना जाता है। 
दक्षिण पूर्वी पठारी प्रदेश में राजस्थान की 13% जनसंख्या निवास करती है। 
दक्षिणी पूर्वी पठारी प्रदेश सर्वाधिक वर्षा वाला प्रदेश है। 
दक्षिणी पूर्वी पठारी प्रदेश सर्वाधिक नदियों वाला प्रदेश है। 
मुकंदवाड़ा की पहाड़ियां कोटा जिले में स्थित है। 
शाहबाद क्षेत्र - राजस्थान के बांरा  जिले के पूर्वी पठारी प्रदेश जंहा घोड़े के नाल के आकार की पहाड़ियां पाई जाती हैं शाहबाद क्षेत्र कहलाता है। 
मेसा का पठार- मेसा का पठार चित्तौड़गढ़ जिले में स्थित है। 
लसाडिया का पठार उदयपुर जिले में स्थित है। 
ऊपरमाल - भैंसरोडगढ़ से बिजोलिया तक का पठारी भाग ऊपरमाल के नाम से जाना जाता है
दक्षिणी पूर्वी पठारी प्रदेश को दो भागों में विध्यन कगार भूमि एवं ढक्कन का लावा पठार भूमि में विभक्त किया गया है। 
विध्यन कगार भूमि – यह क्षेत्र विशाल बालुका पत्थरों से निर्मित है
ढक्कन का  लावा पठार - ढक्कन का लावा पठार बूंदी में मुकंद बाड़ा की पहाड़ियां इसी पठारी भाग का अवशेष है। 
जसवंतपुरा की पहाड़ियां जालौर जिले में स्थित है। 
त्रिकूट पहाड़ी जैसलमेर में स्थित है। 
पीड  माउंट का मैदान - अरावली श्रेणी में देवगढ़ के समीप निर्जन पहाडियों को पीड माउंट का मैदान कहा जाता है। 

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